जनकपुर के जानकी मंदिर में विराजमान हैं राम-सीता की विवाहकालीन प्रतिमाएं, जमाई राजा श्रीराम को दिन में पांच बार लगता है भोग
नेपाल के जनकपुर धाम में आज भी निभाई जाती है मिथिला की अनूठी परंपरा, टीकमगढ़ की महारानी ने नौ लाख चांदी की अशर्फियां खर्च कर बनवाया था भव्य जानकी मंदिर।
जनकपुर (नेपाल)। नेपाल के मधेश प्रदेश स्थित धनुषा जिले का पवित्र नगर जनकपुर भगवान श्रीराम और माता सीता के विवाह की पावन स्मृतियों को आज भी संजोए हुए है। यहां स्थित भव्य जानकी मंदिर अपनी अद्भुत वास्तुकला, धार्मिक मान्यताओं और अनूठी परंपराओं के कारण श्रद्धालुओं के आकर्षण का प्रमुख केंद्र है। इस मंदिर की सबसे खास बात यह है कि यहां भगवान श्रीराम को केवल आराध्य देव नहीं, बल्कि मिथिला के जमाई राजा के रूप में पूजा जाता है।
मान्यता है कि भगवान श्रीराम और माता सीता का विवाह इसी पवित्र भूमि पर हुआ था। विवाह के समय भगवान श्रीराम की आयु 18 वर्ष और माता सीता की आयु 16 वर्ष मानी जाती है। इसी कारण मंदिर में भगवान श्रीराम और माता सीता के बाल एवं दांपत्य स्वरूप की विशेष आराधना की जाती है।
जमाई राजा श्रीराम को पांच बार लगता है भोग
जनकपुर में भगवान श्रीराम के प्रति मिथिला के पारंपरिक आतिथ्य भाव की अनूठी झलक दिखाई देती है। यहां जमाई राजा श्रीराम को दिन में पांच बार भोग अर्पित किया जाता है। सुबह सबसे पहले खीर का भोग लगाया जाता है। इसके बाद नाश्ते में दही, चूड़ा और मिठाइयां परोसी जाती हैं। दोपहर में 56 से लेकर 106 प्रकार के विशेष व्यंजनों से सुसज्जित राजभोग अर्पित किया जाता है। संध्या के समय फलाहार तथा रात्रि में पुनः राजभोग लगाया जाता है।
विवाह मंडप में विराजमान हैं राम-सीता की तीन जोड़ी प्रतिमाएं
जानकी मंदिर के विवाह मंडप में भगवान श्रीराम, माता सीता और उनके परिजनों की प्रतिमाएं स्थापित हैं। यहां श्रीराम के चारों भाइयों की प्रतिमाएं भी विराजमान हैं। विवाह की स्मृतियों को जीवंत रखने वाला यह मंडप श्रद्धालुओं के लिए विशेष आस्था का केंद्र है।
मंदिर में राम-सीता की तीन जोड़ी प्रतिमाओं का विशेष महत्व है। इनमें से दो जोड़ी प्रतिमाओं की स्थापना टीकमगढ़ की महारानी द्वारा कराई गई थी। इसके अतिरिक्त भरत-मांडवी तथा लक्ष्मण-श्रुतकीर्ति की प्रतिमाएं भी विराजमान हैं।
टीकमगढ़ की महारानी ने कराया था भव्य मंदिर का निर्माण
जानकी मंदिर का इतिहास भी अत्यंत रोचक है। मान्यता के अनुसार वर्तमान मंदिर का निर्माण टीकमगढ़ की महारानी वृषभानु कुंवरी ने कराया था। मंदिर निर्माण की आधारशिला वर्ष 1894 में रखी गई और 11 फरवरी 1911 को इसका निर्माण पूर्ण हुआ।
मंदिर के निर्माण में लगभग नौ लाख चांदी की अशर्फियां खर्च होने का उल्लेख मिलता है। इसी कारण इसे 'नौलखा मंदिर' के नाम से भी जाना जाता है।
प्राचीन इतिहास और अद्भुत वास्तुकला का संगम
जानकी मंदिर का निर्माण एक प्राचीन किले की शैली में किया गया है। इसकी भव्य संरचना, आकर्षक गुंबद, कलात्मक बुर्ज और विशाल प्रांगण इसे विशेष पहचान देते हैं। मंदिर में लगभग 60 कमरे बताए जाते हैं। गर्भगृह, शीश महल और अन्य धार्मिक स्थल इसकी भव्यता को और बढ़ाते हैं।
मंदिर से जुड़ी मान्यताओं के अनुसार जनकपुर में माता जानकी की प्रतिमा की प्राप्ति के बाद यह स्थान प्रमुख तीर्थ के रूप में विकसित हुआ। आज भी यहां प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं।
जनकपुर धाम केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि भारत और नेपाल की साझा सांस्कृतिक विरासत, रामायण परंपरा और मिथिला के अतिथि-सत्कार का जीवंत प्रतीक है।